भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

थोडा मन के अंदर देख / विजय वाते

Kavita Kosh से
द्विजेन्द्र द्विज (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 12:14, 11 जून 2010 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पल पल देख निरंतर देख,
थोडा मन के अंदर देख ।
 
कैसे खेल दिखाता है,
आदमजात कलंदर देख ।

इंद्र सभा मे क़ैद हुआ,
स्वर्ग का राजा इन्दर देख ।

अंदर से सारे प्यासे,
नदियाँ और समंदर देख ।

वो भी कितना तनहा है,
दुनिया जीत सिकंदर देख ।