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दिल की इक हर्फ़ ओ हिकायात है ये भी न सही / 'शोला' अलीगढ़ी

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दिल की इक हर्फ़ ओ हिकायात है ये भी न सही
गर मिरी बात में कुछ बात है ये भी न सही

ईद को भी वो नहीं मिलते हैं मुझ से न मिलें
इक बरस दिन की मुलाक़ात है ये भी न सही

दिल में जो कुछ है तुम्हारे नहीं पिन्हाँ मुझ से
ज़ाहिरी लुत्फ़ ओ मुदारात है ये भी न सही

ज़िंदगी हिज्र में भी यूँ ही गुज़र जाएगी
वस्ल की एक ही रात है ये भी न सही

मेरी तुर्बत पे लगाते नहीं ठोकर न लगाओ
ये ही बस उन की करामात है ये भी न सही

काट सकते हैं गला ख़ुद भी न कीजिए हमें क़त्ल
आप के हाथ में इक बात है ये भी न सही

क़त्ल-ए-क़ासिद पे कमर बाँधी हैं ‘शोला’ उस ने
ख़त किताबत की मुलाक़ात है ये भी न सही