भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

धड़कनों के बीच कस्तूरी लिए / राजेश शर्मा

Kavita Kosh से
आशिष पुरोहित (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 12:51, 22 मार्च 2012 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=राजेश शर्मा |संग्रह= }} {{KKCatGeet}} <poem> धड़क...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


धड़कनों के बीच कस्तूरी लिए ,
प्रश्न ये है गंध को कैसे जियें ,
अब किसी आनंद को कैसे जियें,
 
ज़िन्दगी ने सीखलीं भरना कुलांचें,
मान नहीं करता कि अब इतिहास बाँचें.
घुंघरुओं में बांधकर चरों दिशाएँ ,
हम बिना सुर-ताल के निर्बाध नाचें.
 
जब अकेले ही विचारने हृदय हो,
झुण्ड के अनुबंध को कैसे जियें.
 
एक भटके लक्ष्य पर,सौ-सौ शिकारी,
हर शिकारी की हवाओं पर सवारी.
जब नहीं हो पेड़- पौधा शेष कोई,
तब बचेगी ज़िन्दगी कैसे हमारी.
 
फूल ओढ़े आवरण पर आवरण हैं ,
प्रस्फुटित मकरंद को कैसे जियें.
 
हम नहीं हें सिर्फ, इकलौते अभागे,
जो बहारों के शिखर से कूद भागे.
और भी हैं , बंधुवर, मेरे तुम्हारे ,
जो रहे हैं दौड़ में हरबार आगे.
 
रास्ते पहुचे कसैली खाइयों में ,
चिर-रसीले छंद को कैसे जियें