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धरती की आँख / भवानीप्रसाद मिश्र

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चन्द्रमा और मंगल पर उतर गए हम
अब गुरु और शुक्र पर उतरने वाले हैं
आसमान में उठकर ग्रहों पर उतरने का यह
सिलसिला जारी रहेगा
मगर शायद इसीलिए एक देश
दूसरे देश पर पहले से भी भारी रहेगा

क्योंकि धरती को चूस कर ही
चढ़ या उतर सकता है कोई
आसमान के ग्रहों पर
ज़रूरतें चूसने वालों की
वैसे भी बढ़ रही थीं
मगर नई यह ज़रूरत इतनी ख़र्चीली है
कि मान लें अगर हम इन चूसने वालों को
धरती से ज़रा अलग

और मान लें धरती को ब्रह्माण्ड की आँख
तो दिखेगा हमें कि समूची धरती गोली है
डबडबाई हुई आँख की तरह
आँधी और तूफ़ान और वर्षा में
फँसे हुए पँछी की पाँख की तरह !

(यह कविता अभी तक (यानी मार्च 2023 तक) अप्रकाशित मानी जाती है।