भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"नया शिवाला / इक़बाल" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
 
पंक्ति 4: पंक्ति 4:
 
}}
 
}}
  
 +
{{KKCatNazm}}
  
सच कह दूँ ऐ ब्रह्मन गर तू बुरा न माने<br>
+
सच कह दूँ ऐ बिरहमन<ref>ब्राह्मण
तेरे सनम कदों के बुत हो गये पुराने<br><br>
+
</ref> गर तू बुरा न माने<br>
 +
तेरे सनमकदों के बुत हो गये पुराने<br><br>
  
 
अपनों से बैर रखना तू ने बुतों से सीखा<br>
 
अपनों से बैर रखना तू ने बुतों से सीखा<br>
जंग-ओ-जदल सिखाया वाइज़ को भी ख़ुदा ने<br><br>
+
जंग-ओ-जदल<ref>दंगा-फ़साद</ref> सिखाया वाइज़<ref>उपदेशक</ref> को भी ख़ुदा ने<br><br>
  
तंग आके आख़िर मैं ने दैर-ओ-हरम को छोड़ा<br>
+
तंग आके मैंने आख़िर दैर-ओ-हरम<ref>मंदिर-मस्जिद</ref> को छोड़ा<br>
वाइज़ का वाज़ छोड़ा, छोड़े तेरे फ़साने<br><br>
+
वाइज़ का वाज़<ref>उपदेश</ref> छोड़ा, छोड़े तेरे फ़साने<br><br>
  
 
पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है<br>
 
पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है<br>
 
ख़ाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है<br><br>
 
ख़ाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है<br><br>
  
ग़ैरत के पर्दे इक बार फिर उठा दें<br>
+
ग़ैरियत<ref>अपरिचय</ref> के पर्दे इक बार फिर उठा दें<br>
 
बिछड़ों को फिर मिला दें नक़्श-ए-दुई मिटा दें<br><br>
 
बिछड़ों को फिर मिला दें नक़्श-ए-दुई मिटा दें<br><br>
  
पंक्ति 26: पंक्ति 28:
 
दामान-ए-आस्माँ से इस का कलस मिला दें<br><br>
 
दामान-ए-आस्माँ से इस का कलस मिला दें<br><br>
  
हर सुबह मिल के गायें मन्तर वो मीठे मीठे<br>
+
हर सुबह मिल के गायें मन्तर वो मीठे- मीठे<br>
सारे पुजारियों को मै प्रीत की पिला दें<br><br>
+
सारे पुजारियों को मय प्रीत की पिला दें<br><br>
  
शक्ती भी शान्ती भी भक्तों के गीत में है<br>
+
शक्ती<ref>शक्ति</ref> भी शान्ती<ref>शांति</ref> भी भक्तों के गीत में है<br>
धरती के वासियों की मुक्ती प्रीत में है<br><br>
+
धरती के वासियों की मुक्ती<ref>मुक्ति </ref> पिरीत<ref>प्रीत</ref> में है<br><br>

13:28, 16 सितम्बर 2010 के समय का अवतरण

सच कह दूँ ऐ बिरहमन<ref>ब्राह्मण </ref> गर तू बुरा न माने
तेरे सनमकदों के बुत हो गये पुराने

अपनों से बैर रखना तू ने बुतों से सीखा
जंग-ओ-जदल<ref>दंगा-फ़साद</ref> सिखाया वाइज़<ref>उपदेशक</ref> को भी ख़ुदा ने

तंग आके मैंने आख़िर दैर-ओ-हरम<ref>मंदिर-मस्जिद</ref> को छोड़ा
वाइज़ का वाज़<ref>उपदेश</ref> छोड़ा, छोड़े तेरे फ़साने

पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है
ख़ाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है

आ ग़ैरियत<ref>अपरिचय</ref> के पर्दे इक बार फिर उठा दें
बिछड़ों को फिर मिला दें नक़्श-ए-दुई मिटा दें

सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्ती
आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें

दुनिया के तीरथों से ऊँचा हो अपना तीरथ
दामान-ए-आस्माँ से इस का कलस मिला दें

हर सुबह मिल के गायें मन्तर वो मीठे- मीठे
सारे पुजारियों को मय प्रीत की पिला दें

शक्ती<ref>शक्ति</ref> भी शान्ती<ref>शांति</ref> भी भक्तों के गीत में है
धरती के वासियों की मुक्ती<ref>मुक्ति </ref> पिरीत<ref>प्रीत</ref> में है