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निर्वाण दशकम् / आदि शंकराचार्य

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                निर्वाणदशकम्
न भूमिर्न तोयं न तेजो न वायुर्न खं नेंद्रियं वा न तेषां समूहः ॥
अनैकांतिकत्वात्सुषुप्त्येकसिद्धस्तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥१॥

न वर्णा न वर्णाश्रमाचारधर्मा न मे धारणा ध्यानयोगादयोऽपि ॥
अनात्माश्रयोऽहं ममाध्यासहीनात्तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥२॥

न माता पिता वा न देवा न लोका न वेदा न यज्ञा न तीर्थं ब्रुवंति ॥
सुषुप्तौ निरस्तातिशून्यात्मकत्वात्तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥३॥

न साख्यं न शैवं न तत्पांचरात्रं न जैनं मीमांसकादेर्मतं वा ॥
विशिष्टानुभूत्याविशुद्धात्मकत्वात्तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥४॥

न शुक्लं न कृष्णं न रक्तं न पीतं न पीनं न कुब्जं न ह्रस्वं न दीर्घम् ॥
अरूपं तथा ज्योतिराकारक्त्वात्तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥५॥

न जाग्रन्न मे स्वप्नको वा सुषुप्तिर्न विश्वो न वा तैजसः प्राज्ञको वा ॥
अविद्यात्मकत्वात्र्नयाणां तुरीयं तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥६॥

न शास्ता न शास्त्रं न शिष्यो न शिक्षा न च त्वं न चाहं न चायं प्रपंचः ॥
स्वरूपावबोधाद्विकल्पासहिष्णुस्त्देकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥७॥

न चोर्ध्वं न चाधो न चांतर्न बाह्यं न मध्यं न तिर्यङ् न पूर्वा परा दिक् ॥
वियद्व्यापकत्वादखंडैकरूपतदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥८॥

अपिव्यापकत्वादितत्वात्मप्रयोगात् स्वतः सिद्धभावादनन्याश्रयत्वात् ॥
जगत्तुच्छमेतत्समस्तं तदन्यस्तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥९॥

न चैकं तदन्यद्वितीयं कुतः स्यान्नः चाकेलत्वं न वा केवलत्वात् ॥
न शून्यं न चाशून्यमद्वैतकत्वात्कथं सर्ववेदान्तसिद्धं ब्रवीमि ॥१०॥
  (इति श्रीच्छंकराचार्य विरचितं निर्वाणदशकं संपूर्णम्)