भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"न हुई ख़त्म शब, सहर न हुई / रविंदर कुमार सोनी" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
 
पंक्ति 14: पंक्ति 14:
 
ग़म कि रूदाद मुख़्तसर न हुई  
 
ग़म कि रूदाद मुख़्तसर न हुई  
  
दूर करती जो यास कि ज़ुल्मत  
+
दूर करती जो यास की ज़ुल्मत  
 
शम्मा रोशन वो मेरे घर न हुई  
 
शम्मा रोशन वो मेरे घर न हुई  
  

15:49, 25 फ़रवरी 2012 के समय का अवतरण

न हुई ख़त्म शब, सहर न हुई
इक दुआ भी तो बा असर न हुई

आसमाँ चुप, ज़मीं सरअफ़गन्दा
मर गया दिल, उन्हें ख़बर न हुई

हाए तूल ए शब ए फ़िराक़, ऐ दोस्त
ग़म कि रूदाद मुख़्तसर न हुई

दूर करती जो यास की ज़ुल्मत
शम्मा रोशन वो मेरे घर न हुई

मुल्तफ़ित मुझ पे दुनिया क्या होती
मेरी जानिब तिरी नज़र न हुई