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पतझर (हाइकु) / भावना कुँअर

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1
पेड़ों से छीना
पतझर ने रूप
भूले न जीना।
2
ये पतझर
उदासी भर लाया
बदली काया।
3
सुरों का मेला
लगेगा अब कैसे
उदास बेला।
4
हुआ न व्यर्थ
ये जीवन तुम्हारा
जिया बसन्त।
5
ले गईं विदा
शाख से ये पत्तियाँ
फिर मिलेंगी।
6
फिर सजेगीं
पेड़ और लताएँ
आस लगाएँ।
7
फिर झूमेंगी
हरी-भरी डालियाँ
खिल उठेंगी।
8
गाएगी पिकी
उठेंगी हिलौर भी
मत रो सखी।
9
फिर सजेंगी
सुरों की महफिलें
शामें झूमेंगी।
10
सभा लगेगी
सुनवाई भी होगी
पंच बैठेंगे।
11
ओढ़ेगी लता
हरियाली चूनर
दुल्हन बन।
12
इत्र फैलेगा
भौंरे फेरे डालेंगे
दिल मिलेंगे।
-0-