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बरसात / महेन्द्र भटनागर

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सांध्य का वातावरण धूमिल गहन तम में
छिप गया दिन भी शिशिर-सा शुष्क-मौसम में !

तप्त धरती पर उमड़कर छा रहे बादल
बह रहीं मोहक बयारें सिंधु से शीतल !

ताप में अब डूबती घड़ियाँ बिताओ मत
त्रास्त हो आकाश में आँखें लगाओ मत,

दूर दक्खिन से नयी बरसात आयी है
यह तभी बिजली गगन में चमचमायी है !
1945