भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बाहुयुग्मों पर विलासिनि... / कालिदास

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 01:20, 6 मई 2008 का अवतरण (New page: {{KKGlobal}} {{KKAnooditRachna |रचनाकार=कालिदास |संग्रह=ऋतुसंहार‍ / कालिदास }} Category:संस्कृत :...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मुखपृष्ठ  » रचनाकारों की सूची  » रचनाकार: कालिदास  » संग्रह: ऋतुसंहार‍
»  बाहुयुग्मों पर विलासिनि...
लो प्रिये हेमन्त आया!

बाहुयुग्मों पर विलासिनि

के वलय अन्गद नहीं हैं

नव दुकूल न नितम्बों पर

कमल श्री पद में नहीं है,

पीन उन्नत स्तनों पर

अंशुक नहीं वे सूक्ष्म दिखते,

हेम रत्न प्रदीप्त मेखल

से नितम्ब न और सजते,

नुपूरों में हंस रव

बजता न पग-पग पर गुंजाया
प्रिये हेमन्त आया!