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"बिके हाट में / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’" के अवतरणों में अंतर

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न हम हार माने
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न वे माँगें जुदाई।
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सिर ताने खड़े थे।
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न कभी जाना हमें,
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अलग है दिशाएँ
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अब मिल न पाएँ।
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हम क्या करें!
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दुआएँ बेअसर
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भटके रात-दिन,
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जहाँ भी रुके,
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गरम आँसुओं से
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दर गीला मिला था।
  
 
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14:14, 12 फ़रवरी 2018 के समय का अवतरण

16
पीछा न छोड़ें
गर्दिशें चली आईं
मुँह नहीं ये मोड़ें,
गिरे बारहा,
न हम हार माने
न वे माँगें जुदाई।
17
बिके हाट में
वे साधु-सन्त ज्ञानी
जो लगाए मुखौटे,
हम न बिके
भले दो कौड़ी के थे
सिर ताने खड़े थे।
18
बीता जीवन
न पहचाना हमें
न कभी जाना हमें,
बदली राहें,
अलग है दिशाएँ
अब मिल न पाएँ।
19
दूर सागर
लेके खाली गागर
भरने चले हम,
बाँटी हमने
हर बूँद पथ में
जो सागर से पाई.
20
हम क्या करें!
दुआएँ बेअसर
भटके रात-दिन,
जहाँ भी रुके,
गरम आँसुओं से
दर गीला मिला था।