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बी-नारी दूसरा-चित्र / उर्मिल सत्यभूषण

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यह, बेचारी औरत है
देह की ठठरी में
पेट की गठरी में
फिर एक बच्चा
बार-बार बनती है जच्चा
चार बजे उठती है
बीड़ी सुलगाती है
बिन दूध, गुड़ की
‘चा’ सब को पिलाती है
फिर काम पर जाती है।
घर-घर जाकर बर्तन मांजती है
झाड़ती, बुहारती है
जाड़े में ठिठुरती हुई
तीन गज के कपड़े से
लाज को ढकती हुई
छोटी सी चदरिया
सिर पर लिपटा कर
चुप्पी की चेपियां
मुंह पर चिपकाकर
गली-गली जाती है
यदा-कदा बीच में
बीड़ी सुलगाती है
जरा सा सुस्ताती है
अकड़ी हुई देह को
सीधा करने लगती है
याद कुछ आता है
तो फिर चलने लगती है
पैंरों को घसीटती है
बिवाईयां टीसती हैं
सूजी हुई उंगलियां
और गले हुए पोर हैं
दर्द पुर-ज़ोर है
रिसता हुआ खून है
पाँवों पर, कंधों पर
जीवन का बोझ है
सम्हलती, संभालती,
कदम-कदम डालती
आगे बढ़ती जाती है
पपड़ी जमे होंठ हैं
धुंआख सा रंग है
उजाले कहाँ, बस
स्याहियां ही संग हैं
पच्चीस की उम्र में
पचास की लगती है
भूख से बेहाल,
फटेहाल...
जिये जाती है
ज़िन्दगी की गाड़ी को
आगे लिये जाती है।