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बुलडोज़र / अरुण देव

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नई सदी का उजाड़ फैला है
आधुनिकता के उत्तर में

तर्क और विवेक के टूटे हुए पुरज़े बिखरे हैं
आस्था के अनुयायियों की सामूहिक प्रार्थनाओं में जुटने लगी है भीड़
बड़ी रौनक है देवालयों में

सत्ता और सम्पत्ति का यह नव साम्राज्य देसी है

दूसरे की आज़ादी का सम्मान अब जर्जर वह बूढ़ा
सड़क किनारे बचकर चलता हुआ

कुफ्र की संहिताओं में रोज़ जुड़ रहे हैं अध्याय
इसका विधान न्यायालयों से बाहर दण्ड तय कर रहा है

उदारता, अहिंसा, सहमेल आरोप हैं
जो उदात्त है मानवीय है वह षड्यन्त्र है
जो असहमत है, अलग है, द्रोही है

कमज़ोर और लाचार तो संदिग्ध हैं ही
जिसके मत का कोई मतलब नहीं
वह बेमतलब
घुसपैठिया है

वर्तमान के मरघट में जलती चिताओं से
चुपचाप लौट रहें हैं लोग
विरोध नहीं, विभ्रम है

सहमति और चुप्पी का देस यह
लोग जैसे ख़ुद को सज़ा दे रहे हों
आग से खेलते-खेलते जैसे
घिर गए हों

इन्हें तैयार कर लिया गया है तानाशाही के लिए

धरती की नागरिकता का प्रकाश स्तम्भ ढह गया है
बुलडोज़र बढ़ रहा है आगे ।