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बैरी बदरा / मुनेश्वर ‘शमन’

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घर में पाहुन बैरी बदरा सूना हमर अँगना सखिया।
बरजूँ बार-बार बेदरदी मानय नञ कहना सखिया।।

थम-थम गरजे रिमझिम बरसे,
हमर जियरबा तिल-तिल तरसे।
साँझ पहर बेकल बन निकलूँ,
देहरी पर, पल-पल में घर से।।
सावन में कहवाँ भरमइलन, परदेसी सजना सखिया !

घर-पिछूअउती झिंगुर झनके;
सेज छुअय पग पायल छनके।
रसवन्ती रतिया, बिन रसिया,
माटी लगय देह चन्नन के।।
निंदिया पलक दुआर न आवय छेड़ करय कंगना, सखिया !

भरल ताल प्यासल मन-गगरी,
तकि-तकि हँसय गगन में बिजुरी।
बेंत के बाँह पकड़, बरखा में,
पचतावय बेली के लतरी।।
नेह के पीर निठुर की जानय चैन परय पल ना, सखिया !