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भित्ता भित्ता / विमल गुरुङ

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बन्धन-बन्धन छ चारैतिर
पुग्न सक्दिनँ
मेरो मन हेर्न युवतीको कोठासम्म
रस्सी-रस्सी छ सर्बोपरि
शब्दहरु अलिकति पनि ओकल्न सक्दिनँ
गुणखानी अगाडी
सुन्दरताको प्रतिमूर्तीलाइ रोकेर
मुस्कुराउन
बिल्कुल असक्षम भइरहेछ
रुसोले
ठिक भनेको थियो
भित्ता-भित्ता छ पाइला-पाइलामा ।