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"भूल-ग़लती / अनिल अनलहातु" के अवतरणों में अंतर

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मेरे भीतर से चलकर
 
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वह मुझ तक आया
 
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और एक जोर का
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तमाचा लगाकर
 
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चलता बना
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मैं अवाक्, हतबुद्धि, फाजिल सन्नाटे में था,
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मैं अवाक्, हतबुद्धि, फ़ाजिल सन्नाटे में था,
 
कि मेरी आस्थाओं की नग्नता देख
 
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वह रुका
 
वह रुका
 
बड़े विद्रूप ढंग-से मुस्कराया
 
बड़े विद्रूप ढंग-से मुस्कराया
औ’ आशंका और संभावनाओं
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औ’ आशंका और सम्भावनाओं
के चंद टुकड़े
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उछालकर मेरी ओर
 
उछालकर मेरी ओर
चला गया
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चला गया
स्मृतियों के जंगलाती महकमें से
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स्मृतियों के जँगलाती महकमे से
 
निकल तब
 
निकल तब
 
एक-एक कर चले आते
 
एक-एक कर चले आते
 
और बैठते जाते
 
और बैठते जाते
खेत की टेढ़ी-मेढ़ी मेड़ो पर पंक्तिबद्ध
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खेत की टेढ़ी-मेढ़ी मेड़ों पर पँक्तिबद्ध
यहां से वहां
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यहाँ से वहाँ
जंगल से लेकर गाँव के सिवान तक,
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जँगल से लेकर गाँव के सिवान तक,
और शुरू हो जाती अंतहीन बहसें
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और शुरू हो जाती अन्तहीन बहसें
सुबह से रात और रात से सुबह तक
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तब तक जब तक
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सुबह से रात और रात से सुबह तक  
मंदिर की दरकी दीवारों के पार
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तब तक, जब तक
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मन्दिर की दरकी दीवारों के पार
 
गर्भ-गृह के सूनेपन मे सिहरता ईश्वर
 
गर्भ-गृह के सूनेपन मे सिहरता ईश्वर
 
कूच कर जाता है और मस्जिद से आती
 
कूच कर जाता है और मस्जिद से आती
अज़ान की आवाजों में
+
अज़ान की आवाज़ों में
खुदा ठहर-सा जाता है
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ख़ुदा ठहर-सा जाता है
 
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17:35, 22 जुलाई 2019 के समय का अवतरण

मेरे भीतर से चलकर
वह मुझ तक आया
और एक ज़ोर का
तमाचा लगाकर
चलता बना ।

मैं अवाक्, हतबुद्धि, फ़ाजिल सन्नाटे में था,
कि मेरी आस्थाओं की नग्नता देख
वह रुका
बड़े विद्रूप ढंग-से मुस्कराया
औ’ आशंका और सम्भावनाओं
के चन्द टुकड़े
उछालकर मेरी ओर
चला गया ।

स्मृतियों के जँगलाती महकमे से
निकल तब
एक-एक कर चले आते
और बैठते जाते
खेत की टेढ़ी-मेढ़ी मेड़ों पर पँक्तिबद्ध
यहाँ से वहाँ
जँगल से लेकर गाँव के सिवान तक,
और शुरू हो जाती अन्तहीन बहसें ।

सुबह से रात और रात से सुबह तक
तब तक, जब तक
मन्दिर की दरकी दीवारों के पार
गर्भ-गृह के सूनेपन मे सिहरता ईश्वर
कूच कर जाता है और मस्जिद से आती
अज़ान की आवाज़ों में
ख़ुदा ठहर-सा जाता है ।