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मंगलाचार / टोमास ट्रान्सटोमर

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जागरण स्वप्न से लगाई गयी एक ऊंची छलांग है
घुटन भरे भंवर से मुक्त
यात्री पहुँचता है सुबह के हरियाले क्षेत्र में.
चीज़ें चमक उठती हैं. स्पंदित लवा* के स्थान से
देखता है वह, पेड़ों की वृहद् जड़ प्रणाली को
जैसे हों लहराते भूमिगत दीप. भूमि के ऊपर,
उष्णकटिबंधीय बाढ़ में- पृथ्वी की हरियाली
है बाहें उठाये खड़ी, मानों सुन रही हो
किसी अदृश्य पम्पिंग स्टेशन की लयबद्ध धडकनें. और वह
पहुँचता है ग्रीष्म की ओर, उतारा जाता है
उसके चकाचौंध भरे गड्ढ़ों में, नीचे
हरे नम युगों की दरारों के बीच
कंपकंपाते हुए सौर टरबाइन के अधीन. फिर समाप्त होती है
यह ऊर्ध्वाधर यात्रा एक क्षण में, और विस्तारित पंख
हो जाते हैं जैसे बहते पानी पर मछारंग का विश्राम.
कांस्य युग के तुरही का
प्रतिबंधित स्वर
स्थिर लटकता है अथाह शून्य पर.

दिन के शुरुआती घंटों में चेतना मुट्ठी में कर सकती है सम्पूर्ण जगत को
वैसे ही जैसे हथेली पकड़ती है सूरज की गर्मी से उष्ण हुए पत्थर को.
यात्री पेड़ के नीचे खड़ा है. क्या
मौत के भंवर से गुज़रने के बाद,
एक महान रौशनी प्रस्तरित होगी उसके मस्तक पर?

  • गायन के लिए विख्यात भूरी धब्बेदार यूरोपीय लवा पक्षी



(मूल स्वीडिश से अनुवाद : अनुपमा पाठक)