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मनजी ! मुसाफ़िर रे ! / दयाराम

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मनजी ! मुसाफ़िर रे ! चलो निज देश की ओर !
देश बहुत देखा रे ! मुसाफ़िरी हो गई बहुत  !
स्वपुर जाने का पंथ आया, न भूलना भाई !
फिर से रास्ता मिलेगा नहीं, ऐसी तो है कठिनाई,
समझकर सीधे रे ! ना जाना दाहिने के बाएँ । मनजी !

बीच इस रस्ते लुटेरे मारने बैठे हैं दो-चार ,
तुम भी रखो कुछ एक पहरेदार, तब न होगा उनका भय,
मिला है एक भेदिया रे ! उसने बताई सब गत । मनजी !

अब सौदा करो सेठ के नाम से,न होगी कहीं कोई रुकावट
अपने नाम में खतरा है, भाये दानी<ref>वसूल करने वाला</ref> को दाँव-पेंच,
तभी तो अच्छा है ! ना बनो सौदे के मालिक । मनजी !

देखो युग से गुज़रना है, करो सम्हलकर काम,
दास दया को यही चाहिए अब पहुँचे निज धाम,
लगता है अब ऐसा रे ! पूरी हो गई अवधि अपनी । मनजी !
                       

मूल गुजराती भाषा से अनुवाद : क्रान्ति कनाटे

शब्दार्थ
<references/>