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"मन की झील / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’" के अवतरणों में अंतर

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ताल मिले गहरे,
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हों यक्षों के पहरे ।
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दे दो शीतलता तो
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उत्तर कुछ सूझे ।
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पाया तुमको
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अब कुछ पा जाएँ
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खोकर तुम्हें
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तुम ही बतलाओ
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क्या कुछ बचता है ?
  
 
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14:10, 12 फ़रवरी 2018 के समय का अवतरण

6
मन की झील,
चुन-चुन पत्थर
फेंके हैं अनगिन,
साँस लें कैसे
घायल हैं लहरें
तट गूँगे बहरे ।
7
रूप –कुरूप
कोई नर या नारी
दु:ख सदा रुलाए,
प्यार –सुगन्ध
ये ऐसी है बावरी
सबको गमकाए ।
8
शीतल जल
जब चले खोजने
ताल मिले गहरे,
पी पाते कैसे
दो घूँट भला जब
हों यक्षों के पहरे ।
9
प्रश्न हज़ारों
पिपासाकुल मन
पहेली कैसे बूझें,
तुम जल हो
दे दो शीतलता तो
उत्तर कुछ सूझे ।
10
पाया तुमको
अब कुछ पा जाएँ
मन में नहीं सोचा ,
खोकर तुम्हें
तुम ही बतलाओ
क्या कुछ बचता है ?