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मैकाले के खिलौने / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल

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इस कविता में कवि ने अँग्रेज़ों की जी-हुज़ूरी करने वाले अँग्रज़ी-भक्त-भारतीयों पर व्यंग्य कसा है

मेड इन जापान खिलौनों से,
सस्ते हैं लार्ड मैकाले के ।
ये नये खिलौने, इन को लो,
पैसे के सौ-सौ, दो-दो सौ ।।
 
अँग्रेज़ी ख़ूब बोलते ये,
सिगरेट भी अच्छी पीते हैं ।
हो सकते हैं सौ से दो सौ,
ये नये खिलौने मैकाले के ।।

ये सदा रहेंगे बन सेवक,
हर रोज़ करें झुककर सलाम ।
हैं कहीं नहीं भी दुनिया में,
मिलते इतने क़ाबिल ग़ुलाम ।

..................
..................
तब तक यह घटने के बजाय
हो जायेंगे करोडों-लाखों ।

ये सस्ते हैं इन्हें ले लो
पैसे के सौ-सौ, दो-दो सौ ।