भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

मौसी की उलझन / संजय अलंग

Kavita Kosh से
आशिष पुरोहित (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 17:26, 21 फ़रवरी 2012 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=संजय अलंग }} {{KKCatBaalKavita}} <poem> डाली मौसी घर ...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


डाली मौसी घर को आईं
नटखट बाबी को खूब घुमाईं
सोने को जब दोनों आईं
बाबी ने एक बात बताई
 
चन्दा है बिल्ली का भाई
मौसी बोली-कैसी यह रीत बनाई

ऍसा कैसे होगा बाबी
होती नहीं ऐसी कोई चाभी

बाबी ने तब पहेली बुझाई
उत्तर झटपट वह ले आई

मैं नहीं करती कोई ड्रामा
चन्दा होते हैं मेरे मामा
होती बिल्ली भी मेरी मौसी
सो ऐसी बात है मैने सोची
होंगे ज़रूर दोनो बहन-भाई
यही सच्ची बात है मैने बताई

रिश्तेदारी आपकी कैसी न्यारी
मौसी भौंचक सारी की सारी