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यदि मैं होता / सुशील कुमार झा / जीवनानंद दास

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यदि मैं होता वनहंस
और हंसिनी होती तुम,
कहीं दूर दिशाओं के पार किसी नदी के किनारे
धान के खेतों के पास झूमते घासों के भीतर
दुनिया के नज़रों से छिपा
एक निराला नीड़ होता अपना भी;

नीले आकाश में बिखरे हज़ारों तारे, मानो ट्यूलिप के खेत और
शिरीष के जंगल के किसी घोंसले में सुनहले अंडे जैसा फागुनी चाँद

तब
इस फाल्गुन की रात में
शाखाओं के पीछे से चाँद को छांकते देख
गुम हो जाते उस चमकते आकाश में –
छोड़कर इस बहते पानी की गंध को
तुम्हारा रक्त-स्पंदन ही बन जाता मेरा पंख

हठात अगर गूंजती गोली की आवाज :
बिखर जाते हम,
थम जाते हमारे पंखों का उल्लास,
जम जाते हमारे कंठों में उत्तरी हवाओं के गीत,
अगर फिर गूंजती एक और गोली की आवाज :
बच जाती सिर्फ स्तब्धता और चारों ओर बिखरी शान्ति,

फिर रहता ही नहीं आज की तरह
ये टुकड़ा टुकड़ा मृत्यु,
और उसके चाह की व्यर्थता,
और अंधकार।

यदि मैं होता वनहंस और हंसिनी होती तुम,
दूर पेड़ों के उस पार उसी नदी के किनारे
धान के खेतों के पास
झूमते घासों के भीतर।