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"रुलाकर चल दिए इक दिन / शैलेन्द्र" के अवतरणों में अंतर

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'''गीतकार : मजरुह सुल्तानपुरी'''
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रुला कर चल दिये इक दिन
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हँसी बन कर जो आये थे
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चमन रो-रो के कहता है
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कभी गुल मुस्कुराये थे
  
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अगर दिल के ज़ुबां होती तो
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ग़म कुछ कम तो हो जाता
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उधर वो चुप इधर सीने में
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हम तूफ़ां छुपाये थे
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चमन रो-रो के कहता है ...
  
मिला दिल, मिल के टूटा जा रहा है<br />
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ये अच्छा था न हम कहते
नसीबा बन के फूटा जा रहा है..
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किसी से दास्तां अपनी
 
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समझ पाये न जब अपने
दवा-ए-दर्द-ए-दिल मिलनी थी जिससे<br />
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पराये तो पराये थे
वही अब हम से रूठा जा रहा है
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चमन रो-रो के कहता है ...
 
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अंधेरा हर तरफ़, तूफ़ान भारी<br />
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और उनका हाथ छूटा जा रहा है  
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दुहाई अहल-ए-मंज़िल की, दुहाई<br />
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मुसाफ़िर कोई लुटा जा रहा है
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11:18, 1 मार्च 2010 के समय का अवतरण

रुला कर चल दिये इक दिन
हँसी बन कर जो आये थे
चमन रो-रो के कहता है
कभी गुल मुस्कुराये थे

अगर दिल के ज़ुबां होती तो
ग़म कुछ कम तो हो जाता
उधर वो चुप इधर सीने में
हम तूफ़ां छुपाये थे
चमन रो-रो के कहता है ...

ये अच्छा था न हम कहते
किसी से दास्तां अपनी
समझ पाये न जब अपने
पराये तो पराये थे
चमन रो-रो के कहता है ...