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रूप-तारा तुम पूर्ण प्रकाम / सुमित्रानंदन पंत

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रूप-तारा तुम पूर्ण प्रकाम;
मृगेक्षिणि! सार्थक नाम।
एक लावण्य-लोक छबिमान,
नव्य-नक्षत्र समान,
उदित हो दृग-पथ में अम्लान
तारिकाओं की तान!
प्रणय का रच तुमने परिवेश
दीप्त कर दिया मनोनभ-देश;
स्निग्ध सौन्दर्य-शिखा अनिमेष!
अमन्द, अनिन्द्य, अशेष!

उषा सी स्वर्णोदय पर भोर
दिखा मुख कनक-किशोर;
प्रेम की प्रथम गदिरतम-कोर
दृगों में दुरा कठोर;
छा दिया यौवन-शिखर अछोर
रूप किरणों में बोर;
सजा तुमने सुख-स्वर्ण-सुहाग,
लाज-लोहित-अनुराग!
नयन-तारा बन मनोभिराम,
सुमुखि, अब सार्थक करो स्वनाम!

तारिका-सी तुम दिव्याकार,
चन्द्रिका की झंकार!
प्रेम-पंखों में उड़ अनिवार
अप्सरी-सी लघु-भार,
स्वर्ग से उतरी क्या सोद्गार
प्रणय-हंसिनि सुकुमार?
हृदय सर में करने अभिसार,
रजत-रति, स्वर्ण-विहार!

आत्म-निर्मलता में तल्लीन
चारु-चित्रा-सी, आभासीन;
अधिक छिपने में खुल अनजान
तन्वि! तुमने लोचन मन छीन
कर दिए पलक-प्राण गति-हीन,
लाज के जल की मीन!
रूप की-सी तुम ज्वलित-विमान,
स्नेह की सृष्टि नवीन!
हृदय-नभ-तारा बन छबिधाम
प्रिये! अब सार्थक करो स्वनाम!

प्रथम-यौवन मेरा मधुमास,
मुग्ध-उर मधुकर, तुम मधु, प्राण!
शयन लोचन, सुधि स्वप्न-विलास,
मधुर-तन्द्रा प्रिय-ध्यान;
शून्य-जीवन निसंग आकाश,
इन्दु-मुख इन्दु समान;
हृदय सरसी, छबि पद्म-विकास,
स्पृहाएँ उर्मिल-गान!

कल्पना तुममें एकाकार,
कल्पना में तुम आठों याम;
तुम्हारी छबि में प्रेम-अपार;
प्रेम में छबि अभिराम;
अखिल इच्छाओं का संसार
स्वर्ण-छबि में निज गढ़ छबिमान,
बन गई मानसि! तुम साकार
देह दो एक-प्राण!

रचनाकाल: नवंबर’ १९२५