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लत / रमेश क्षितिज

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जीउने लतमा फसेको छु मर्न डर लाग्छ
यत्ति ठूलो संसारमा तिम्रै भर लाग्छ

आफन्तले टाढा पारे साथीभाइले माया मारे
दुश्मनसँग सँगै बसी हाँस्न कर लाग्छे

कतै ओत खोज्दै हिँड्छ मेरो खुसी सुकुम्बासी
फिरन्ते म मलाई तिम्रै आँखा घर लाग्छ

दुःख आउँछ बास बस्छ मित्रता छ हाम्रो
दुश्मनी छ सुखसँग देखे पर लाग्छ