भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

वसन्त / केदारनाथ अग्रवाल

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 23:56, 8 जनवरी 2008 का अवतरण (New page: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=केदारनाथ अग्रवाल |संग्रह=फूल नहीं रंग बोलते हैं-1 / केद...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज




हिम के हत संकुचित प्रकृति अब फूली

रूप-राग-रस-गंध-भार भर झूली

रंगों से अभिभूत हुई चट्टानें

जड़ता में जागीं जीवन की तानें

नभ में भी आलोक-नील गहराया

सागर ने संगीत तरंगित गाया

आठ रूप शिव के, समाधि को त्यागे

मृण्मय अवनी के अंगों में जागे

वासंतिक वैभव यौवन पर आया

हरा-भरा संसार खिला मुस्काया ।