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विकल है देश / महेन्द्र भटनागर

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गुलामी से विकल है देश, यह निष्प्राण-सा सारा,
उदासी और असफलता, पलायन का हुआ नारा !

दुखी, ठंड़ी मरण साँसें, मलिन जीवन, अमित बंधन,
कृशित तन, नग्न, मरणासन्न, कुंठितमन-निराशा क्षण !

प्रगति अवरुद्ध, विपदा लक्ष, शोषण है मनुज बंदी,
मिटा बिगड़ा समाजी तन, पतन की है लहर गंदी !

दशा युग की करुण है, आज वाणी में नहीं बँधती,
नहीं बँधती, विषम है साधना स्वर में नहीं सधती !

पड़ी कटु फूट आपस में, नहीं है मेल किंचित भी,
निरंतर बढ़ रहे नव दल, विभाजन है नवीन अभी !

कहाँ जनता ? पड़ी निर्जीव-सी बनकर, घिरा है तम,
निजी कुछ स्वार्थ में अंधे मनुज बस पूजते कि अहम् !

सिपाही छोड़ दो आलस, कहीं दुश्मन न खा जाये,
नहीं अब नींद के झोंके, बुरी हालत न आ जाये,

तुम्हारे देश के दीपक बुझाए जा रहे हैं जब,
नज़र के सामने लाकर मिटाए जा रहे हैं जब !

खड़े हो नाश के अन्तिम किनारे पर, सरल गिरना,
कि दुश्मन एक धक्के से मिटा देगा यहाँ वरना !