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वीतराग भी / ओमप्रकाश सारस्वत

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हम तुझको पाने निकले थे
खुद को खो बैठे

हम बेगाने-से, वीरानों में
भटक रहे-से
जग की निमर्मता से, अपना सिर
पटक रहे-से
हम अध-पगली बुद्धि की
मन को दाद दिए-से
हम तुझे हँसाने निकले थे
खुद ही रो बैठे

हम आशाओं के दीप लिए
श्रद्धा का चन्दन
ले मृदुभावों की गँध-कुसुम
मन में अभिनन्दन
भावना-अर्घ्य से, अर्चन
करके मेरे ईश्वर
दृग जल से चरण पखारेंगे
खुद को धो बैठे
इन उलझी-उलझी अन्तहीन
लम्बी राहों में
निज को हम चले समेट
स्वयँ अपनी बाहों में
हम वीत-राग भी आत्मरति में
निरत रहे जो औरों के होने के बदले
खुद के हो बैठे