भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

वैराग्य-संदीपनी / भाग २ / तुलसीदास

Kavita Kosh से
मृदुल कीर्ति (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 16:09, 1 फ़रवरी 2009 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=तुलसीदास }} {{KKPageNavigation |पीछे=वैराग्य-संदीपनी / भाग १ / ...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


तन करि मन करि बचन करि, काहू दुखत नाहिं,
तुलसी ऐसे संत जन रामरूप जग माहिं [२३]

मुख दीखत पातक हरै, परसत करम बिलाहिं
बचन सुनत मन मोह्गत, पूरब भाग मिलाहिं [२४]

अति कोमल अरु बिमल रूचि, मानस में मल नाहिं,
तुलसी रत मन हुई रहे, अपने साहिब मांहि [२५]

जाके मन ते उठि गई, तिल-तिल तृष्णा चाहि,
मनसा बाचा कर्मना, तुलसी बंदत ताहि [२६]

कंचन काँचही सम गनै, कामिनी काष्ठ पषान,
तुलसी ऐसे संतजन, पृथ्वी ब्रह्म समान [२७]

कंचन को मृतिका करि मानत,
कामिनी काष्ठ सिला पहिचानत।
तुलसी भूलि गयो रस एहा,
ते जन प्रगट राम की देहा॥ [२८] [चौपाई]

आकिंचन इन्द्रीदमन, रमन राम एक तार,
तुलसी ऐसे संत जन, बिरले या संसार [२९]

अहंबाद 'मैं' 'तैं' नहीं, दुष्ट संग नहिं कोय,
दुःख ते दुःख नहिं ऊपजे, सुख तें सुख नहिं होय [३०]

सम कंचन कान्चै गिनत, सत्रु मित्र सम दोए,
तुलसी या संसार में, कहत संत जन सोए [३१]

बिरले बिरले पाएये, माया त्यागी संत,
तुलसी कामी कुटिल कलि, केकी केक अनंत [३२]

मैं तैं मेट्यो मोह तम, उग्यो आत्मा भानु,
संत राज सो जानिए, तुलसी या सहिदानु [३३]

संत - महिमा - वर्णन

को बरनै सुख एक, तुलसी महिमा संत की,
जिन्ह के बिमल बिबेक, सेस महेस न कही सकत [३४] [सोरठा]

माहि पत्री करी सिन्धु मसि, तरु लेखनी बनाए,
तुलसी गनपत सों तदपि, महिमा लिखी न जाए [३५]

धन्य धन्य माता पिता,धन्य पुत्र बार सोय,
तुलसी जो रामहिं भजे, जैसेहूँ कैसेहूँ कोय [३६]

तुलसी जाके बदन ते, धोखेहूँ निकसत राम,
ताके पग की पगतरी, मेरे तन को चाम [३७]

तुलसी भगत सुपच भलौ, भजै रैन दिन राम.
ऊँचो कुल केहि काम को, जहाँ न हरी को नाम [३८]

अति ऊँचे भू धरनि पर, भुजगन के अस्थान,
तुलसी अति नीचे सुखद, ऊख अन्न अरु पान [३९]

अति अनन्य जो हरि को दासा,
रतै नाम निसिदिन प्रति स्वासा।
तुलसी तेहि समान नहीं कोई,
हम नीकें देखा सब कोई॥ [४०] [चौपाई]

जदपि साधु सबही बिधि हीना,
तद्यपि समता के न कुलीना।
यह दिन रैन नाम उच्चरै,
वह नित मान अगिनी मंह जरै॥ [४१] [चौपाई]