भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

शब-ओ रोज़ रोने से क्या फ़ायदा है / ज़िया फतेहाबादी

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 02:00, 27 मार्च 2011 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=ज़िया फतेहाबादी |संग्रह= }} {{KKCatGhazal‎}}‎ <poem> शब ओ रोज़ …)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

शब ओ रोज़ रोने से क्या फ़ायदा है ?
गरेबाँ भिगोने से क्या फ़ायदा है ?

जहाँ फूल ख़ुद ही करें कार-ए निशतर,
वहाँ ख़ार बोने से क्या फ़ायदा है ?

उजालों को ढूँढो सहर को पुकारो,
अन्धेरों में रोने से क्या फ़ायदा है ?

हमें मोड़ना है रुख़-ए मौज-ए दरिया,
सफ़ीना भिगोने से क्या फ़ायदा है ?

तेरी याद से दिल को बहला रहा हूँ,
मगर इस खिलौने से क्या फ़ायदा है ?

सितारों से नूर-ए सहर छीन लो तुम,
शब-ए ग़म में रोने से क्या फ़ायदा है ?

परीशानियाँ हासिल-ए ज़िन्दगी हैं,
परीशान होने से क्या फ़ायदा है ?

वही तीरगी है अभी तक दिलों में
’ज़िया’ सुबह होने से क्या फ़ायदा है ?