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"शहीद भगत सिंह / सरफरोशी की तमन्ना" के अवतरणों में अंतर

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सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
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देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है ।
  
करता नहीं क्यों दुसरा कुछ बातचीत,
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करता नहीं क्यों दूसरा कुछ बातचीत,
 
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल मैं है ।
 
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल मैं है ।
  
रहबर राहे मौहब्बत रह न जाना राह में
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यों खड़ा मक़्तल में कातिल कह रहा है बार-बार
लज्जत-ऐ-सेहरा नवर्दी दूरिये-मंजिल में है ।
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यों खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार
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क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है ।
 
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है ।
  
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हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।
 
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।
  
खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मींद,
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खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का जमघट आज कूंचे-ऐ-कातिल में है ।
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आशिकों का आज जमघट कूचा-ऐ-कातिल में है ।
  
 
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
 
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।
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देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है ।
 
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01:42, 20 मार्च 2010 के समय का अवतरण

रचनाकार: बिस्मिल अज़ीमाबादी                 

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है ।

करता नहीं क्यों दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल मैं है ।

यों खड़ा मक़्तल में कातिल कह रहा है बार-बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है ।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफिल में है ।

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।

खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूचा-ऐ-कातिल में है ।

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है ।