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"शैशव यौवन और सपने / सुधा गुप्ता" के अवतरणों में अंतर

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प्रकृति परी
+
सुन रे बच्चे!
हाथ लिये घूमती
+
सपने तेरे बड़े
जादू की छड़ी
+
नयन छोटे
मोहक रूप धरे
+
आकाश तेरा घर
सब का मन हरे
+
ले उड़ान जी-भर
  
धरा  सुन्दरी!
+
नाप धरा  है
तेरा मोहक रूप
+
आकाश औ’ पाताल
बड़ा निराला
+
पल भर में
निज धुन मगन
+
मुठ्ठी भर का दिल
हर कोई मतवाला
+
कितनी हलचल!
  
वसन्त आया
+
एक जुगनू
बहुत ही बातूनी
+
फ़्रॉक की अँजोर में
हुई हैं मैना
+
नन्ही मुठ्ठी में
चहकती फिरतीं
+
दो बीरबहूटियाँ
अरी, आ, री बहना
+
मुग्ध  शैशव!
  
आम की डाली
+
यादों के मेले
खुशबू बिखेरती
+
चपल थी बालिका
पास बुलाती
+
भोला संसार
‘चिरवौनी’ करती है
+
घी-डाली खिचड़ी थी
पिकी, चोंच मार के
+
औ’ आम का आचार
  
चाँदनी स्नात
+
तोड़ा घरौंदा
शरद-पूनो रात
+
हँस रहा बालक
भोर के धोखे
+
लात मार के
पंछी चहचहाते
+
रोती खड़ी बालिका
जाग पड़ता वन
+
ख़ुशी चकनाचूर
  
मायके आती
+
बिना पंख के
गंध मदमाती-सी
+
उड़ती है लड़की
कली बेला की
+
खुले आकाश
वर्ष में एक बार
+
बरज रही दुनिया
यही रीति-त्योहार
+
माने न कोई बाधा
  
शेफाली खिली
+
सूरज हँसे
वन महक गया
+
धरा  कैसी दीवानी
ॠतु ने कहा:
+
अजब नशा
गर्व मत करना
+
रोज़ देखे सपने
पर्व यह भी गया
+
कभी न हों अपने
  
काम न आई
+
द्वार पे खड़ी
कोहरे की रज़ाई
+
थर-थर काँपती
ठण्डक खाई
+
भूख औ’ डर
छींक-छींक रजनी
+
पन्नी की आस लिये
आँसू टपका रही
+
वह मलिन बच्ची
  
दुग्ध-धवल
+
छोटा केबिन
चाँदनी में नहाया
+
फ़ाइलों का अम्बार
शुभ्र, मंगल
+
कम्प्यूटर पे
आलोक जगमग
+
झुकी, सपने लिये
हँस रहा जंगल
+
सहमी कबूतरी
  
तम घिरा रे
+
निडर चोर
काजल के पर्वत
+
सब चुरा ले गया
उड़ते आए
+
नींद, सपने
जी भर बरसेंगे
+
छोड़ गया तो बस
धान-बच्चे हँसेंगे
+
सूजी-सूजी पलकें
  
घुमन्तू मेघ
+
धान की पौध
बड़े ही दिलफेंक
+
रोपती हैं औरतें
शम्पा को देखा
+
बोती सपने
शोख़ी पे मर मिटे
+
बँधे नया छप्पर
कड़की, डरे, झरे
+
बेटी जाये ‘पी’ घर
  
बड़ी सुबह
+
बड़ा कठिन
सूरज मास्टर दा’
+
गुलाब को गूँथना
किरण-छड़ी
+
माला बनाना
ले, आते-धमकाते
+
पँखुरी-पँखुरी हो
पंछी पाठ सुनाते
+
बिखरता जाता वो
  
सलोनी भोर
+
मन्दिर तक
श्वेत चटाई बिछा
+
बिछी है पगडण्डी
नीले आँगन
+
हाथों में फूल
फुरसत में बैठी
+
किशोरी दौड़ रही
कविता पढ़ रही
+
सपनों की पोटली
  
फाल्गुनी रात
+
पेंग बढ़ाती
बस्तर की किशोरी
+
आशा के हिंडोले पे
सज-धज के
+
युवा लड़की
‘घोटुल’ को तैयार
+
आज़ाद आकाश में
चाँद ढूँढ लिया है
+
पंछी भरे उड़ान
  
वर्षा की भोर,
+
मीठी है हँसी
मेघों की नौका-दौड़
+
मधुर बचपन
शुरू हो गई
+
बेफ़िक्र दौड़
‘रेफरी’ थी जो हवा,
+
सपनों की गठरी
खेल शामिल हुई
+
उठाए फिरे मन
  
वन -पथ में
+
रवि के नाम
जंगली फूल-गंध
+
भेजी है एक पाती
वनैली घास
+
यूँ तो अनाम
चीना-जुही लतर
+
पहुँच ही जायेगी
सोई राज कन्या-सी
+
खोजती पता-धाम
  
सज के बैठी
+
साझा आँगन
आकाश की अटारी
+
साझी हैं ख़ुशियाँ भी
बालिका-बधू
+
साझी है धूप
नीला आँचल उठा
+
नहाए जी भर के
झाँके मासूम घटा
+
बरसी माँ की धूप
  
वर्षा से ऊबे
+
ठेले में लादे
शरदाकाश तले
+
हरी-भरी ककड़ी
हरी घास पे
+
बेचे सपने:
रंग-बिरंगे पंछी
+
‘लैला की अँगुली लो
पिकनिक मनाते
+
मँजनू की पसली’
  
आज सुबह
+
फूलों की नाव
आकाश में अटकी
+
सपन-पतवार
दिखाई पड़ी
+
खोजती फिरे
फटी कागज़ी चिट्ठी
+
स्वर्ण केशी कन्या को
आह! टूटा चाँद था!!
+
भटकता यौवन
 
+
ज्वर से तपे
+
जंगल के पैताने
+
आ बैठी धूप
+
प्यासा बेचैन रोगी
+
दो बूँद पानी नहीं
+
 
+
कोयलिया ने
+
गाए गीत रसीले
+
कोई न रीझा
+
धन की अंधी दौड़
+
कान चुरा ले भागी
+
 
+
जी भर जीना
+
गाना-चहचहाना
+
पंछी सिखाते:
+
केवल वर्तमान
+
कल का नहीं भान
+
 
+
परिन्दे गाते
+
कृतज्ञता से गीत
+
प्रभु की प्रति:
+
उड़ने को पाँखें दीं
+
और चंचु को दाना
+
 
+
पौष का सूर्य
+
सामने नहीं आता
+
मुँह चुराता
+
बेवफ़ा नायक-सा
+
धरती को रुलाता
+
 
+
धरा  के जाये
+
वसन्त आने पर
+
खिलखिलाए
+
फूले नहीं समाए
+
मस्ती में गीत गाए
+
 
+
बहुत छोटा
+
तितली का जीवन
+
उड़ती रहे
+
पराग पान करे
+
कोई कुछ न कहे
+
 
+
जंगल गाता
+
भींगुर लेता तान
+
झिल्ली झंकारे
+
टिम-टिम जुगनू
+
तरुओं के चौबारे
+
 
+
अपने भार
+
झुका है हरसिंगार
+
फूलों का बोझ
+
उठाए नहीं बने
+
खिले इतने घने
+
 
+
सूरज मुखी
+
सूर्य दिशा में घूमें
+
पूरे दिवस
+
प्रमाण करते-से
+
भक्ति भाव में झूमें
+
 
+
पावस ॠतु:
+
प्रिया को टेर रहा
+
हर्षित मोर
+
पंख पैफला नाचता
+
प्रेम-कथा बाँचता
+
 
+
पेड़ हैरान
+
पूछें- हे भगवान्!
+
इंसानी लिप्सा
+
हम क्या करेंगे जी?
+
कट-कट मरेंगे जी?
+
 
+
हुई जो भोर
+
टुहँक पड़े मोर
+
देखा नशारा
+
नीली बन्दनवार
+
अक्षितिज सजी थी
+
 
+
छींटे, बौछार
+
भिगो, खिलखिलाता
+
शोख़ झरना
+
स्फटिक की चादर
+
किसने जड़े मोती?
+
 
+
पाँत में खड़े
+
गुलमोहर सजे
+
हरी पोशाक
+
चोटी में गूँथे फूल
+
छात्राएँ चलीं स्कूल
+
 
+
ठण्डी बयार
+
सलोनी-सी सुबह
+
मीठी ख़ुमारी
+
कोकिल कूक उठी
+
अजब जादूगरी
+
 
+
बढ़ता जाये
+
ध्रती का बुख़ार
+
आर न पार
+
उन्मत्त है मानव
+
स्वयंघाती दानव
+
 
+
दिवा अमल
+
सरि में हलचल
+
पाल धवल
+
खुले जो तट बँध्
+
नौका चली उछल
+
 
+
फेंकता आग
+
भर-भर के मुट्ठी
+
धरा  झुलसी
+
दिलजला सूरज
+
जला के मानेगा
+
 
+
रात के साथी
+
सब विदा हो चुके
+
फैली उजास
+
अटका रह गया
+
फीके धब्बे-सा चाँद
+
 
+
आया आश्विन
+
मतवाला बनाए
+
हवा खुनकी
+
मनचीता पाने को
+
चाह पिफर ठुनकी
+
 
+
सृष्टि सुन्दरी
+
फिर- फिर रिझाती
+
मत्त यौवना
+
टूट जाता संयम
+
अनादि पुरुष का
+
 
+
मैल, कीचड़
+
सड़े पत्तों की गंध
+
लपेटे तन
+
बंदर-सी खुजाती
+
आ खड़ी बरसात
+
 
+
सिर पे ताज
+
पीठ पर है दाग़
+
गीतों की रानी
+
गाती मीठा तराना
+
वसन्त! फिर आना
+
 
+
प्रिय न आए
+
बैठी दीप जलाए
+
आकाश तले
+
आँसू गिराती निशा
+
न रो, उषा ने कहा
+
 
+
गुलाबी, नीले
+
बैंगनी व धवल
+
रंग-निर्झर
+
सावनी की झाड़ियाँ
+
हँस रहीं जी भर
+
 
+
बुलबुल का
+
बहार से मिलन
+
रहा नायाब
+
गाती रही तराना
+
खिलते थे गुलाब
+
 
+
किसकी याद
+
सिर पटकती है
+
लाचार हवा
+
खोज-खोज के हारी
+
नहीं दर्द की दवा
+
 
+
आ गया पौष
+
लाया ठण्डी सौगातें
+
बर्फीली रातें
+
पछाड़ खाती हवा
+
कोई घर न खुला
+
  
 +
कहीं तो होगीं
 +
हँसें तो फूल झरें
 +
रोये तो मोती
 +
रे, चाहत के जोगी!
 +
क्या अब कहीं होगी?
 +
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14:54, 22 मई 2012 का अवतरण


सुन रे बच्चे!
सपने तेरे बड़े
नयन छोटे
आकाश तेरा घर
ले उड़ान जी-भर

नाप धरा है
आकाश औ’ पाताल
पल भर में
मुठ्ठी भर का दिल
कितनी हलचल!

एक जुगनू
फ़्रॉक की अँजोर में
नन्ही मुठ्ठी में
दो बीरबहूटियाँ
मुग्ध शैशव!

यादों के मेले
चपल थी बालिका
भोला संसार
घी-डाली खिचड़ी थी
औ’ आम का आचार

तोड़ा घरौंदा
हँस रहा बालक
लात मार के
रोती खड़ी बालिका
ख़ुशी चकनाचूर

बिना पंख के
उड़ती है लड़की
खुले आकाश
बरज रही दुनिया
माने न कोई बाधा

सूरज हँसे
धरा कैसी दीवानी
अजब नशा
रोज़ देखे सपने
कभी न हों अपने

द्वार पे खड़ी
थर-थर काँपती
भूख औ’ डर
पन्नी की आस लिये
वह मलिन बच्ची

छोटा केबिन
फ़ाइलों का अम्बार
कम्प्यूटर पे
झुकी, सपने लिये
सहमी कबूतरी

निडर चोर
सब चुरा ले गया
नींद, सपने
छोड़ गया तो बस
सूजी-सूजी पलकें

धान की पौध
रोपती हैं औरतें
बोती सपने
बँधे नया छप्पर
बेटी जाये ‘पी’ घर

बड़ा कठिन
गुलाब को गूँथना
माला बनाना
पँखुरी-पँखुरी हो
बिखरता जाता वो

मन्दिर तक
बिछी है पगडण्डी
हाथों में फूल
किशोरी दौड़ रही
सपनों की पोटली

पेंग बढ़ाती
आशा के हिंडोले पे
युवा लड़की
आज़ाद आकाश में
पंछी भरे उड़ान

मीठी है हँसी
मधुर बचपन
बेफ़िक्र दौड़
सपनों की गठरी
उठाए फिरे मन

रवि के नाम
भेजी है एक पाती
यूँ तो अनाम
पहुँच ही जायेगी
खोजती पता-धाम

साझा आँगन
साझी हैं ख़ुशियाँ भी
साझी है धूप
नहाए जी भर के
बरसी माँ की धूप

ठेले में लादे
हरी-भरी ककड़ी
बेचे सपने:
‘लैला की अँगुली लो
मँजनू की पसली’

फूलों की नाव
सपन-पतवार
खोजती फिरे
स्वर्ण केशी कन्या को
भटकता यौवन

कहीं तो होगीं
हँसें तो फूल झरें
रोये तो मोती
रे, चाहत के जोगी!
क्या अब कहीं होगी?
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