भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

सम्मान की खातिर / गंगा प्रसाद विमल

Kavita Kosh से
Dkspoet (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 11:17, 29 अगस्त 2010 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=गंगा प्रसाद विमल |संग्रह= }} {{KKCatKavita}} <poem> ओ मेरे प्रपि…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ओ मेरे प्रपिता
दूरस्थ प्रपिता
सौ साल से भी उपर होंगे
उस उत्सव दिन की शाम को
जब तुमने दिया था मुझे
नाम.
यही तो है बूढ़े चरवाहे की कथा
तुमने प्यार किया सुन्दरी को
पर उसका बाप था थुलथुल महाजन
और दे दी लड़की एक तुर्क को
पैसों के लिए
लेकिन उत्सव दिन ही था
जब विवाह के ढोल डगमगाना शुरू हुए थे
तुमने छीन ली थी लड़की
उनके कब्जे से
साथ ही
मार दिया था दूल्हा अपने मुक्के से
और कसमें खाते हैं चरवाहे
कि तुमने मार दिया था उसे
बाएँ हाथ से ही
बस तभी से रह गया
छुटका-सा नाम
जो रक्षित करता है हमारा सम्मान
'खपचू' (बाएँ हाथ से काम करने वाला)
वाह, मेरे दादा!
दूर गये प्रपितामह!
तुम्हारा ही खून बहता है मेरी नसों में
और मुझे दिया गया है तुम्हारा नाम......
दो मुझे अपनी प्राचीनता
और शक्ति
इसलिए कि जब उकता जाऊँ
हस्तक्षेप से
या डुबाने वाली गप्पों से
नहीं हो सकता आज्ञाकारी
न सुन सकता हूँ आदेश
बन्द करता हूँ उन्हें अपने मुक्के से
बदमाश
बकवादी
तो देता हूँ भयानक लताड़
किसी के मान का मूल्य क्या है.
क्योंकि जिसे प्यार किया था और करता हूँ
किसी को भी नहीं
दादा
उसे नहीं देता समर्पण
अच्छा होता खत्म ही कर देता
इस सिर को
पर इसे होना ही है
सम्मान के निमित्त.