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घृणा का गान
+
रँग गुलाल के
 
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रचनाकार: [[अज्ञेय]]
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रचनाकार: [[कुमार रवीन्द्र]]
 
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सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ,
+
रँग गुलाल के
सुनो घृणा का गान !
+
और फाग के बोल सुहाने
 +
बुनें इन्हीं से संवत्सर के ताने-बाने
  
तुम, जो भाई को अछूत कह,
+
ऋतु-प्रसंग यह मंगलमय हो
वस्त्र बचाकर भागे !
+
हर प्रकार से
तुम, जो बहनें छोड़ बिलखती
+
दूर रहें दुख-दर्द-दलिद्दर
बढ़े जा रहे आगे !
+
सदा द्वार से
रुककर उत्तर दो, मेरा
+
है अप्रतिहत आह्वान—
+
सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ,
+
सुनो घृणा का गान !
+
  
तुम जो बड़े-बड़े गद्दों पर,
+
कभी किसी को
ऊँची दुकानों में
+
कष्ट न दें जाने-अनजाने
उन्हें कोसते हो जो भूखे
+
मरते हैं खानों में
+
तुम, जो रक्त चूस ठठरी को  
+
देते हो जलदान—
+
सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ,
+
सुनो घृणा का गान !
+
  
तुम, जो महलों में बैठे
+
अग्नि-पर्व यह
दे सकते हो आदेश,
+
रंगपर्व यह सच्चा होवे
'मरने दो बच्चे, ले आओ
+
पाप-ताप सब
खींच पकड़कर केश !
+
मन के-साँसों के यह धोवे
नहीं देख सकते निर्धन के  
+
घर दो मुट्ठी धान—
+
सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ,
+
सुनो घृणा का गान !
+
  
तुम, जो पाकर शक्ति कलम में
+
हमें न व्यापें
हर लेने की प्राण-
+
कभी स्वार्थ के कोई बहाने
'निश्शक्तों’ की हत्या में कर
+
सकते हो अभिमान,
+
जिनका मत है, 'नीच मरें,
+
दृढ़ रहे हमारा स्थान'—
+
सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ,
+
सुनो घृणा का गान !
+
  
तुम, जो मन्दिर में वेदी पर
+
यह मौसम है
डाल रहे हो फूल
+
राग-द्वेष के परे नेह का
और इधर कहते जाते हो,  
+
हाँ, विदेह होने का
'जीवन क्या है? धूल !'
+
है यह पर्व देह का
तुम जिसकी लोलुपता ने ही
+
 
धूल किया उद्यान—
+
साँस हमारी
सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ,
+
इस असली सुख को पहचाने
सुनो घृणा का गान !
+
 
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13:13, 27 मार्च 2013 का अवतरण

रँग गुलाल के

रँग गुलाल के
और फाग के बोल सुहाने
बुनें इन्हीं से संवत्सर के ताने-बाने

ऋतु-प्रसंग यह मंगलमय हो
हर प्रकार से
दूर रहें दुख-दर्द-दलिद्दर
सदा द्वार से

कभी किसी को
कष्ट न दें जाने-अनजाने

अग्नि-पर्व यह
रंगपर्व यह सच्चा होवे
पाप-ताप सब
मन के-साँसों के यह धोवे

हमें न व्यापें
कभी स्वार्थ के कोई बहाने

यह मौसम है
राग-द्वेष के परे नेह का
हाँ, विदेह होने का
है यह पर्व देह का

साँस हमारी
इस असली सुख को पहचाने