भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"सिस्टम / 'सज्जन' धर्मेन्द्र" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार='सज्जन' धर्मेन्द्र |संग्रह= }} {{KKCatKavita}...' के साथ नया पन्ना बनाया)
 
 
(इसी सदस्य द्वारा किया गया बीच का एक अवतरण नहीं दर्शाया गया)
पंक्ति 7: पंक्ति 7:
 
<poem>
 
<poem>
 
मच्छर आवाज़ उठाता है
 
मच्छर आवाज़ उठाता है
‘सिस्टम’ ताली बजाकर मार देता है
+
सिस्टम ताली बजाकर मार देता है
और ‘मीडिया’ को दिखाता है भूखे मच्छर का खून
+
और मीडिया को दिखाता है भूखे मच्छर का खून
 
अपना खून कहकर
 
अपना खून कहकर
  
 
मच्छर बंदूक उठाते हैं
 
मच्छर बंदूक उठाते हैं
‘सिस्टम’ ‘मलेरिया’ ‘मलेरिया’ चिल्लाता है
+
सिस्टम मलेरिया-मलेरिया चिल्लाता है
 
और सारे घर में जहर फैला देता है
 
और सारे घर में जहर फैला देता है
  
 
अंग बागी हो जाते हैं
 
अंग बागी हो जाते हैं
‘सिस्टम’ सड़न पैदा होने का डर दिखालाता है
+
सिस्टम सड़न पैदा होने का डर दिखलाता है
 
बागी अंग काटकर जला दिए जाते हैं
 
बागी अंग काटकर जला दिए जाते हैं
 
उनकी जगह तुरंत उग आते हैं नये अंग
 
उनकी जगह तुरंत उग आते हैं नये अंग
  
‘सिस्टम’ के पास नहीं है खून बनाने वाली मज्जा
+
सिस्टम के पास नहीं है खून बनाने वाली मज्जा
 
जिंदा रहने के लिए वो पीता है खून
 
जिंदा रहने के लिए वो पीता है खून
जिसे हम ‘डोनेट’ करते हैं अपनी मर्जी से
+
जिसे हम डोनेट करते हैं अपनी मर्जी से
  
हर बीमारी की दवा है
+
हर बीमारी की दवा है सिस्टम के पास
‘सिस्टम’ के पास
+
हर नया विषाणु इसके प्रतिरक्षा तंत्र को  
हर नया विषाणु इसके प्रतिरक्षा तंत्र को और मजबूत करता है
+
और मजबूत करता है
  
‘सिस्टम’ अजेय है
+
सिस्टम अजेय है
‘सिस्टम’ सारे विश्व पर राज करता है
+
सिस्टम सारे विश्व पर राज करता है
 
क्योंकि ये पैदा हुआ था
 
क्योंकि ये पैदा हुआ था
 
दुनिया जीतने वाली जाति के
 
दुनिया जीतने वाली जाति के
सबसे तेज और कमीने दिमागों में  
+
सबसे तेज और सबसे कमीने दिमागों में  
 
</poem>
 
</poem>

17:10, 7 जुलाई 2014 के समय का अवतरण

मच्छर आवाज़ उठाता है
सिस्टम ताली बजाकर मार देता है
और मीडिया को दिखाता है भूखे मच्छर का खून
अपना खून कहकर

मच्छर बंदूक उठाते हैं
सिस्टम मलेरिया-मलेरिया चिल्लाता है
और सारे घर में जहर फैला देता है

अंग बागी हो जाते हैं
सिस्टम सड़न पैदा होने का डर दिखलाता है
बागी अंग काटकर जला दिए जाते हैं
उनकी जगह तुरंत उग आते हैं नये अंग

सिस्टम के पास नहीं है खून बनाने वाली मज्जा
जिंदा रहने के लिए वो पीता है खून
जिसे हम डोनेट करते हैं अपनी मर्जी से

हर बीमारी की दवा है सिस्टम के पास
हर नया विषाणु इसके प्रतिरक्षा तंत्र को
और मजबूत करता है

सिस्टम अजेय है
सिस्टम सारे विश्व पर राज करता है
क्योंकि ये पैदा हुआ था
दुनिया जीतने वाली जाति के
सबसे तेज और सबसे कमीने दिमागों में