भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

सूर्य-ग्रहण : 3 / अरुण कमल

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


बहुत सुन्दर लगेगा सूर्य


धीरे-धीरे गिरेगा प्रकाश

और अन्त में रह जाएगी एक काली पुतली

रोशनी के वर्क़ में लिपटी,

कभी बस हीरे के नग-सा दमकता सूर्य

कभी मोतियों की माला-सा झिलमिल

कभी गरी की एक फाँक-भर उज्ज्वल

और एक क्षण को धरती पर बिछेगी

प्रकाश और अँधेरे से बुनी चटाई


बहुत सुन्दर, बहुत भव्य है ब्रह्मांड का यह दृश्य

जो लूट सके सो लूट ।


ऎसी सुन्दरता कौन काम की

जिसके देखे दीदा फूटे ?