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हँस रहा है उधर / केदारनाथ अग्रवाल

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हँस रहा है उधर

धूप में खड़ा पूरा पहाड़

खोल कर मोटे बड़े होंठ ।

और चट्टानी जबड़े ।


रो रहा है इधर

शोक में पड़ा जन-समुदाय

काट कर कामकाजी हाथ

तोड़ कर छाती तगड़ी ।