भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

हवा के साथ चलना ही पड़ेगा / विजय राही

Kavita Kosh से
Abhishek Amber (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 12:26, 25 मार्च 2020 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=विजय राही |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatGhazal...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हवा के साथ चलना ही पड़ेगा
मुझे घर से निकलना ही पड़ेगा ।

मेरे लहजे में है तासीर ऐसी,
कि पत्थर को पिघलना ही पड़ेगा ।

पुराने हो गये किरदार सारे,
कहानी को बदलना ही पड़ेगा ।

तुम्ही गलती से दिल में आ गये थे,
तुम्हे बाहर निकलना ही पड़ेगा ।

वो जो मंजिल को पाना चाहता है,
उसे काँटो पे चलना ही पड़ेगा ।