भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"हिन्दी मेरी भाषा / अविनाश" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
पंक्ति 1: पंक्ति 1:
 +
{{KKGlobal}}
 +
{{KKRachna
 +
|रचनाकार=अविनाश 
 +
|संग्रह=
 +
}}
 +
<Poem>
 
हमारे दोस्त कुछ ऐसे हैं
 
हमारे दोस्त कुछ ऐसे हैं
<br />जो दरिया कहने पर समझते हैं कि हम किसी कहानी की बात कर रहे हैं
+
जो दरिया कहने पर समझते हैं कि हम किसी कहानी की बात कर रहे हैं
<br />उन्हें यक़ीन नहीं होता कि समंदर को
+
उन्हें यक़ीन नहीं होता कि समंदर को
<br />समंदर के अलावा भी कुछ कहा जा सकता है
+
समंदर के अलावा भी कुछ कहा जा सकता है
<br /><br />सब्‍जी को शोरबा कहने पर समझते हैं
+
 
<br />ये मैं क्या कह रहा हूँ
+
सब्‍जी को शोरबा कहने पर समझते हैं
<br />ऐसा तो मुसलमान कहते हैं
+
ये मैं क्या कह रहा हूँ
<br /><br />यहाँ तक कि गोश्‍त कहने पर उन्हें आती है उबकाई
+
ऐसा तो मुसलमान कहते हैं
<br />जबकि हजारों-हजार बकरों-भैंसों को
+
 
<br />कटते हुए देखकर भी
+
यहाँ तक कि गोश्‍त कहने पर उन्हें आती है उबकाई
<br />वे गश नहीं खाते
+
जबकि हज़ारों-हज़ार बकरों-भैंसों को
<br />शायद इंसानों के मरने का समाचार भी उन्हें वक्त पर खाने से मना नहीं करता
+
कटते हुए देखकर भी
<br /><br />हमारे गाँव में भी अब बोली जाने लगी है हिंदी
+
वे गश नहीं खाते
<br />पर उस हिंदी में कुछ दिल्ली है, कुछ कलकत्ता
+
शायद इंसानों के मरने का समाचार भी उन्हें वक़्त पर खाने से मना नहीं करता
<br />लखनऊ अभी दूर है
+
 
<br />शहरों में होती हैं भाषाएँ तो भाषा में भी होते हैं शहर
+
हमारे गाँव में भी अब बोली जाने लगी है हिंदी
<br /><br />दोस्त कहते हैं
+
पर उस हिंदी में कुछ दिल्ली है, कुछ कलकत्ता
<br />तुम्हारी हिंदी में सरहद की लकीरें मिट रही हैं
+
लखनऊ अभी दूर है
<br />ये ठीक नहीं है
+
शहरों में होती हैं भाषाएँ तो भाषा में भी होते हैं शहर
<br />पिता खाने की थाली फेंक देते हैं
+
 
<br />बहनें आना छोड़ देती हैं
+
दोस्त कहते हैं
<br />पड़ोसी देखकर बचने की कोशिश करते हैं
+
तुम्हारी हिंदी में सरहद की लकीरें मिट रही हैं
<br /><br />मैं अपनी हिंदी में खोजना चाहता हूं गाँव
+
ये ठीक नहीं है
<br />एक शहर जहाँ दर्जनों तहजीबें हैं
+
पिता खाने की थाली फेंक देते हैं
<br />वे सारे मुल्क़ जहाँ हमारे अपने बसे हुए हैं
+
बहनें आना छोड़ देती हैं
<br /><br />दोस्तों की किनाराक़शी मंजूर है
+
पड़ोसी देखकर बचने की कोशिश करते हैं
<br />मंजूर है हमारे अपने छोड़ जाएँ हमें
+
 
<br />मुझे तो अब गुजराती भी हिंदी-सी लगने लगी है
+
मैं अपनी हिंदी में खोजना चाहता हूँ गाँव
<br /><br />‘वैष्‍णव जन तो तेणे कहिए जे
+
एक शहर जहाँ दर्जनों तहजीबें हैं
<br />पीड़ परायी जाणी रे’
+
वे सारे मुल्क़ जहाँ हमारे अपने बसे हुए हैं
<br /><br />हम जितना मुलायम रखेंगे अपनी जबान
+
 
<br />हमारे पास उतने मुल्क़ बिना किसी सरहद के होंगे
+
दोस्तों की किनाराक़शी मंज़ूर है
<br /><br />कितना मर्मांतक है दुनिया भर के युद्धों का इतिहास!
+
मंज़ूर है हमारे अपने छोड़ जाएँ हमें
 +
मुझे तो अब गुजराती भी हिंदी-सी लगने लगी है
 +
 
 +
‘वैष्‍णव जन तो तेणे कहिए जे
 +
पीर परायी जाणी रे’
 +
 
 +
हम जितना मुलायम रखेंगे अपनी जबान
 +
हमारे पास उतने मुल्क़ बिना किसी सरहद के होंगे
 +
 
 +
कितना मर्मांतक है दुनिया भर के युद्धों का इतिहास!
 +
</poem>

11:14, 12 फ़रवरी 2009 का अवतरण

हमारे दोस्त कुछ ऐसे हैं
जो दरिया कहने पर समझते हैं कि हम किसी कहानी की बात कर रहे हैं
उन्हें यक़ीन नहीं होता कि समंदर को
समंदर के अलावा भी कुछ कहा जा सकता है

सब्‍जी को शोरबा कहने पर समझते हैं
ये मैं क्या कह रहा हूँ
ऐसा तो मुसलमान कहते हैं

यहाँ तक कि गोश्‍त कहने पर उन्हें आती है उबकाई
जबकि हज़ारों-हज़ार बकरों-भैंसों को
कटते हुए देखकर भी
वे गश नहीं खाते
शायद इंसानों के मरने का समाचार भी उन्हें वक़्त पर खाने से मना नहीं करता

हमारे गाँव में भी अब बोली जाने लगी है हिंदी
पर उस हिंदी में कुछ दिल्ली है, कुछ कलकत्ता
लखनऊ अभी दूर है
शहरों में होती हैं भाषाएँ तो भाषा में भी होते हैं शहर

दोस्त कहते हैं
तुम्हारी हिंदी में सरहद की लकीरें मिट रही हैं
ये ठीक नहीं है
पिता खाने की थाली फेंक देते हैं
बहनें आना छोड़ देती हैं
पड़ोसी देखकर बचने की कोशिश करते हैं

मैं अपनी हिंदी में खोजना चाहता हूँ गाँव
एक शहर जहाँ दर्जनों तहजीबें हैं
वे सारे मुल्क़ जहाँ हमारे अपने बसे हुए हैं

दोस्तों की किनाराक़शी मंज़ूर है
मंज़ूर है हमारे अपने छोड़ जाएँ हमें
मुझे तो अब गुजराती भी हिंदी-सी लगने लगी है

‘वैष्‍णव जन तो तेणे कहिए जे
पीर परायी जाणी रे’

हम जितना मुलायम रखेंगे अपनी जबान
हमारे पास उतने मुल्क़ बिना किसी सरहद के होंगे

कितना मर्मांतक है दुनिया भर के युद्धों का इतिहास!