भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

हीरों की पोटली सर पर लादे / गुलाब खंडेलवाल

Kavita Kosh से
Vibhajhalani (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 12:58, 2 जून 2010 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=गुलाब खंडेलवाल |संग्रह=कस्तूरी कुंडल बसे / गुला…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


हीरों की पोटली सर पर लादे
मै सब्जीबाजार में जा पहुँचा
जहाँ सुबह से शाम तक भटकते फिरने पर भी
किसीने मुझे पानी को भी नहीं पूछा
जबकि मेरे अन्य साथी
साग-भाजी की टोकरियाँ लिये
हीरों की मंडी में चले गये
और कौड़ियों की वस्तु सोने के मोल बेचकर भी
यही कहते रहे, 'हम छले गये.'