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{{KKRachna
|रचनाकार=ग़ालिब
|संग्रह= दीवाने-ग़ालिब / ग़ालिब
}}
[[Category:ग़ज़ल]]
तुम से बेजा<ref>बेकार</ref> है मुझे अपनी तबाही का गिला
इसमें उसमें कुछ शाइबा-ए-ख़ूबी-ए-तक़दीर<ref>सौभाग्य की झलक</ref> भी था
तू मुझे भूल गया हो, तो पता बतला दूँ
कभी फ़ितराक<ref>शिकारी का झोला</ref> में तेरे कोई नख़चीर<ref>शिकार</ref> भी था
क़ैद में थी है तेरे वहशी को वही ज़ुल्फ़ की याद हां हाँ कुछ एक इक रंज-ए-गिराँबारिगिरांबारी-ए-ज़ंजीर<ref>बेड़ियों के बोझ का दु:ख</ref> भी था
बिजली इक कौंध गई आँखों के आगे, तो क्या
यूसुफ़ उस को कहूँ, और कुछ न कहे, ख़ैर हुई
गर बिगड़ बैठे तो मैं लायक़-ए-तअज़ीर तअ़ज़ीर <ref>दण्ड का भागी</ref> भी था
देखकर ग़ैर को हो क्यों न कलेजा ठंडा
पकड़े जाते हैं फ़रिश्तों के लिखे पर नाहक़
आदमी कोई हमारा दमेंदमे-तहरीर भी था
रेख़्तेरेख़ते<ref>उर्दू भाषा का पूर्व नाम</ref> के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो "ग़ालिब" कहते हैं अगले ज़माने में कोई "मीर" भी था </poem>
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