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हूण / कन्हैया लाल सेठिया

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मतकर
कुदरत स्यूं
कुचरणी
जे चिंगरगी आ
हुवै लो
परळै
कर दियो तनैं
चेता चूक
भोग री तिसणा
भरै इण री हामळ
नागी बूची बणराय
पंखेरूआं री खोस्योड़ी पांखां
जिनावरां री रंग बिरंगी खालां
खूटग्यो धरती रो
संजीवण
कर दिया
पगफेरो
डूंगरां नै गंजा
समदां नै आकळ बाकळ
अबै खिंडाऊ है
चनरमा री खात
भाजै मंगळ कानी
दिन’र रात
कोनी सूझै
हियै रै आंधै नै
बैठी है हूण
लगा’र घात !