भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"होती है अगर्चे कहने से यारों पराई बात / मीर तक़ी 'मीर'" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
(New page: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=मीर तक़ी 'मीर' }} होती है अगर्चे कहने से यारों पराई बात<br> ...)
 
पंक्ति 10: पंक्ति 10:
 
वो आ गया तो सामने उस के न आई बात<br><br>
 
वो आ गया तो सामने उस के न आई बात<br><br>
  
बुल-बुल के बोलने में सब अंदाज़ हैं मेरे<br>
+
बुलबुल के बोलने में सब अंदाज़ हैं मेरे<br>
 
पोशीदा क्या रही है किसु की उड़ाई बात<br><br>
 
पोशीदा क्या रही है किसु की उड़ाई बात<br><br>
  

22:34, 13 मई 2009 का अवतरण

होती है अगर्चे कहने से यारों पराई बात
पर हम से तो थमी न कभू मूँह पे आई बात

कहते थे उस से मिलते तो क्या-क्या न कहते लेक
वो आ गया तो सामने उस के न आई बात

बुलबुल के बोलने में सब अंदाज़ हैं मेरे
पोशीदा क्या रही है किसु की उड़ाई बात

इक दिन कहा था ये के ख़ामोशी में है वक़ार
सो मुझ से ही सुख़न नहीं मैं जो बताई बात

अब मुझ ज़ैफ़-ओ-ज़ार को मत कुछ कहा करो
जाती नहीं है मुझ से किसु की उठाई बात