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नज़राने रूह / बृज नारायण चकबस्त

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तेरा बन्दा रहे दिल से यही पैमान रहा,
तायरे फ़िक्र[1] तेरे औज[2] से हैरान रहा

क़द्र करना तेरी सीखें यही अरमान रहा
यही मसला, यही मज़हब यही ईमान रहा

आबरू क्या है तमन्ना-ए-वफ़ा[3] में मरना
दीन क्या है किसी कामिल की परस्तिश करना

मुझ से याराने अदम ने ये अगर फ़रमाया
हसरत आबाद जहाँ से तुझे क्या हाथ आया

मैं कहूँगा कि बस एक रहबरे कामिल पाया
ज़िन्दगी की यही दौलत है यही सरमाया

लेके दुनिया से यही महरे वफ़ा आया हूँ
अपने मोहसिन की ग़ुलामी की सनद लाया हूँ।

शब्दार्थ
  1. चिन्तन रूपी पक्षी
  2. शान, ऊँचाई
  3. वफ़ा की इच्छा