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बिसराई गई बहनें और भुलाई गई बेटियाँ / रंजीता सिंह फ़लक

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बिसराई गईं बहनें
और भुलाई गई बेटियाँ
नहीं बिसार पातीं मायके की देहरी

हालाँकि जानती हैं
इस गोधन में नहीं गाए जाएँगे
उनके नाम से भैया के गीत
फिर भी
अपने आँगन में
कूटती हैं गोधन, गाती हैं गीत
अशीषती हैं बाप भाई जिला-जवार को
और देती हैं
लम्बी उम्र की दुआएँ

बिसराई गईं बहनें
और भुलाई गई बेटियाँ
हर साल लगन के मौसम में
जोहती हैं
न्योते का सन्देश
जो वर्षों से नहीं आए उनके दरवाज़े
फिर भी
मायके की किसी पुरानी सखी से
चुपचाप बतिया कर
जान लेती हैं
कौन से
भाई-भतीजे का
तिलक-छेंका होना है ?

कौन-सी बहन-भतीजी की
सगाई होनी है ?

गाँव-मोहल्ले की
कौन-सी नई बहू सबसे सुन्दर है
और कौन सी बिटिया
किस गाँव ब्याही गई है ?

बिसराई गईं बहनें
और भुलाई गई बेटियाँ
कभी-कभी
भरे बाज़ार में ठिठकती हैं,
देखती हैं बार-बार
मुड़कर
मुस्कुराना चाहती हैं
पर
एक उदास ख़ामोशी लिए
चुपचाप
घर की ओर चल देती हैं,
जब
दूर का कोई भाई-भतीजा
मिलकर भी फेर लेता है नज़र,

बिसराई गई बहनें
और भुलाई गई बेटियाँ
अपने बच्चों को
ख़ूब सुनाना चाहतीं हैं
नाना-नानी, मामा-मौसी के क़िस्से
पर
फिर सम्भल कर बदल देतीं हैं बात
और सुनाने लगतीं हैं
परियों और दैत्यों की कहानियाँ।