भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

उसको जिन आँखों से दुनिया दिखती है / गौरव त्रिवेदी

Kavita Kosh से
सशुल्क योगदानकर्ता ५ (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 18:28, 10 अगस्त 2019 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=गौरव त्रिवेदी |अनुवादक= |संग्रह= }} {...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

उसको जिन आँखों से दुनिया दिखती है,
मैने उन आँखों में दुनिया देखी है,

जिसको मेरा हाथ पकड़ना चाहिए था,
वो मेरी इक ग़लती पकड़े बैठी है

आँख से निकली तब मुझको मालूम हुआ,
ख़्वाब की अर्थी पानी जैसी होती है

सन नब्बे में वो दुनिया में आई थी,
सन नब्बे से शाम ये बहकी बहकी है

वो कहती थी मर जाएगी मेरे बिन,
कोई बतलाना तो अब वो कैसी है