भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

फलक ने रंज तीर आह से मेरे ज़ि-बस खेंचा / ख़ान-ए-आरज़ू सिराजुद्दीन अली

Kavita Kosh से
सशुल्क योगदानकर्ता २ (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 01:11, 28 अगस्त 2013 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=ख़ान-ए-आरज़ू सिराजुद्दीन अली }} {{KKCat...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

फलक ने रंज तीर आह से मेरे ज़ि-बस खेंचा
लबों तक दिल से शब नाले को मैं ने नीम रस खेंचा

मिरे शोख़-ए-ख़राबाती की कैफ़िय्यत न कुछ पूछो
बहार-ए-हुस्न को दी आब उस ने जब चरस खेंचा

रहा जोश-ए-बहार इस फ़स्लगर यूँही तो बुलबुल ने
चमन में दस्त-ए-गुल-चीं से अजब रंग उस बरस खेंचा

कहा यूँ साहिब-ए-महमिल ने सुन कर सोज़ मजनूँ का
तकल्लुफ़ क्या जो नाला बे-असर मिस्ल-ए-जरस खेंचा

नज़ाकत रिश्ता-ए-उल्फ़त की देखो साँस दुश्मन की
ख़बरदार ‘आरज़ू’ टुक गर्म कर तार-ए-नफ़स खेंचा