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एक बेटी की चिट्ठी / प्रमोद धिताल / सरिता तिवारी

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माँ
जि़न्दा हूँ आज तक
और मिला है देखने को
वित्ताभर का आकाश और एक टुकड़ा धूप

घर छोड़ते वक़्त
दरवाज़े में ही लगी थी ठोकर
फूट–फूट के रो रही थी गोद की बिटिया
खजुर के घास से कसे हुए भार जैसा
कसी थी दिल
और तनिक भी न मुड़ते हुए पीछे
पकड़ी थी कठोर हृदय से रास्ता

इस यातना गृह की खिड़की से
घुसती है गर्म हवा
और सुखा देती है गिरने से पहले ही
मेरे गाल के गरम-गरम आँसू

देखती हूँ कभी कभी पेड़ में
घोंसला ही गिरने तक
माँ को बुला रहे चिडि़या के बच्चे
सिकुड़ आता है सीना
अटकती है गले में ही साँस
फफक–फफक के रोती हूँ
और याद करती हूँ हर सिसकियों में
मेरे बच्चों के मलिन चेहरे

इतने साल हो गए
गाँव छोड़े हुए
रोते–रोते काठमाण्डू के आकाश से
देश को छोड़े हुए
तुम्हारा ही भरोसा था और छोड़ी थी
बाँस के करले जैसे बच्चे
‘कितनी निर्मम हो गई अभागन !’ कहती होंगी
मेरे आए हुए साल और महीने गिनती होंगी
अकेले ही रोती होंगी और बहाती होंगी
अपने ही गाल की झुर्रियोँ में खोनेवाले आँसू

सोचती हूँ
अब कभी देख पाऊँगी या नहीं तुम्हें?

यहाँ तो
सहस्र युग से भी लम्बे हैं दिन
असंख्य नर्क से भी घिनौनी हैं रात
और हज़ारों बिच्छियों के दंश की पीड़ा से भी
भयानक है जि़न्दगी

तुम कहती थी
‘औरत होना धरती होना है बेटी!’
सच कहती थी !

इधर आने के बाद मैं धरती ही हो गई हूँ
सीने का अन्तिम पत्र भी तोड़ा जाने तक
छिद्र–छिद्र हो गई हूँ
आजीवन रीढ़ सीधा न होने तक
गुलामी से झुक गई हूँ

इस दासता कि जाल तो
महाजन के आँगन से मरुभूमि तक फैला हुआ है माँ!
अब भी कितना लम्बा
और कितने युग तक का होगा यह जाल?

इसी जाल से लपेटते-लपेटते
ख़त्म होगी मेरी उमर
ख़त्म होंगे मेरे सपने
ख़त्म हूँगी यहीं मैं गुमनाम होकर
लेकिन ख़त्म नहीं होगी मेरे साथ ही
एक कंगाल देश की अभागिन औरत की कहानी

आज तक तो
जीवित हूँ माँ
बित्ता-भर का आकाश
और एक टुकड़ा धूप के सहारे!