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अगले पड़ाव पर / मनीष मूंदड़ा

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सोचता हूँ सुबह को अब आराम दूँ
रात तो थक के गुजर गयी
तुम्हारे इंतजार में
सोचता हूँ मन के ऊहापोह
को भी अब कुछ विश्राम दूँ
आँखें पथरा गयी तुम्हारे इंतजार में

माना के वादा नहीं था
कुछ साफ इरादा भी नहीं था
ये भी माना के मैंने तुम्हें रोका नहीं था
पर क्या तुम्हारे पास
और कोई तरीक़ा नहीं था?

जैसे जाने वाले को
कौन रोक पाया है
वैसे ही
मेरे इंतजार की जि़द का भी
कहाँ अंत हो पाया हैं
इस उम्र, या फिर अगले पड़ाव पर
तुम्हारा इंतजार रहेगा...