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कश्मीर / गुलाब खंडेलवाल

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हर कहीं अमृतमयी धारा है
आप विधि ने जिसे सँवारा है
स्वर्ग का एक खंड है कश्मीर
ज्योतिमय मुकुट यह हमारा है
 
एक तस्वीर ख़्वाब की-सी है
एक प्याली शराब की-सी है
चाँद का रूप, रंग केसर का
पंखड़ी ज्यों गुलाब की-सी है
. . .
चोटियों पर हँसी चमक उठती
शून्य में पायलें झमक उठतीं
दुग्ध-से गौर निर्झरों के बीच
देह की द्युति-तड़ित दमक उठती
. . .
सेव के बाग़, चिनारों की पाँत
फूल जैसे वसंत की बारात
प्रेम का स्वप्न-लोक है कश्मीर
ईद का दिवस, दिवाली की रात
. . .
हैं सफेदे सपाट सीधे-से
शीत के संतरी उनींदे-से
बर्फ के फूल कि तमगे तन पर
झड़ रहे रत्न-कण अबींधे-से
. . .
मैं प्रवासी कि जा रहा हूँ आज
शून्य में टूट रही-सी आवाज़
स्वप्न का ताजमहल मिटता-सा
क़ब्र में लौट रही-सी मुमताज
. . .
काँपता  तीर बन गया हूँ मैं
प्राण की पीर बन गया हूँ मैं
शीत हिम अंग, रंग केसर-सा
आप कश्मीर बन गया हूँ मैं
 
अश्रु-हिम की फुहार मेरी है
घाटियों में पुकार मेरी है
चाँद-सा शून्य में टँगा मैं आज
नीलिमा यह अपार मेरी है
 
दर्द मेरा कि जम गयी ज्यो झील
प्यास मेरा कि बही झेलाम्नील
रात रोती चिनार-कुंजों की
स्वप्न मेरा कि गयी धरती लील